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भवसागर पड़ी मेरी नैया —सौरभ मधुकर

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भवसागर पड़ी मेरी नैया अब आ जा रे मेरे कन्हैया कहीं डूब ना जाऊं मझधार में मेरी नईया का बन जा खेवईया बीच सभा में जब द्रौपदी ने तुमको टेर लगाई थी प्रेम के बंधन में बंध कर तूने बहन की लाज बचाई थी जब द्रौपदी ने तुमको पुकारा आया बहना का बन के तू भइया कहीं डूब ना जाऊं मझदार में मेरी नइया का बन जा खेवईया सखा सुदामा से साँवरिया तूने निभायी थी यारी मीरा के विष के प्याले को अमृत कर दिया बनवारी नानी,नरसी ने तुझको पुकारा आया आया तू बंशी बजईया कहीं डूब ना जाऊं मझधार में मेरी नईया का बन जा खेवईया जरा सामने तो आ साँवरिया छुप छुप छलने में क्या राज है यूँ छुप ना सकेगा तू मोहन मेरी आत्मा की ये आवाज़ है ‘सौरभ मधुकर’ हमने सुना है भगत बिना भगवान नहीं भावना के भूखे है भगवन,कहते वेद पुराण यही आज मैंने भी तुझको पुकारा,आके थाम ले मेरी तू बइयां कहीं डूब ना जाऊं मझधार में मेरी नईया का बन जा खेवईया भवसागर पड़ी मेरी नैया अब आ जा रे मेरे कन्हइया कहीं डूब ना जाऊं मझधार में मेरी नईया का बन जा खेवईया
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