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दशा माता की कथा | व्रत की पौराणिक कथा और महत्व

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एक समय की बात है, एक राजा था। जब नाई उनके बाल काटने आया तो उसने राजा को बताया कि एक बहुत ही सुन्दर कन्या है। उस कन्या को दशामाता का इष्ट था। वह पीपल की प्रतिदिन पूजा करती । दशामाता की कहानियाँ सुनती थी। दशामाता ने सोचा कि मेरा नियम रखने वाली की शादी अच्छी जगह होनी चाहिए। तो फिर राजा ने नाई से कहा कि ऐसी सुन्दर कन्या से मैं शादी कर लू। राजा ने उस कन्या से शादी कर ली। शादी करके महल में आये। राजा के एक रानी पहले से ही थी। उस रानी ने सोचा कि इतनी सुन्दर दूसरी रानी आ जाएगी तो मेरा रुतबा और आदर कम हो जायेगा। तो फिर जब बड़ी रानी काले हाथ करके आयी और नयी रानी के मुँह पर लगा दिए। राजा ने जब नयी रानी का चेहरा देखा तो बहुत दुखी हुए की नाई ने हमारे साथ धोखा करा। ऐसे काले मुँह वाली गिलहरी जैसी शक्ल वाली लड़की से मेरी शादी करा दी। राजा ने नयी रानी को अलग कक्ष में रख दिया, उससे बातचीत भी नहीं करते थे और उसकी तरफ देखते भी नहीं थे। राजा के ऐसे व्यवहार से छोटी रानी बहुत दुःखी हो गयी। उसको समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे, कैसे राजा को समझाए। फिर कुछ समय पश्चात् उसने अपने पीयर खबर भेजी कि मेरे चार रंग की पौशाक, वैसी ही चौपड़ और झूले की रस्सी भेजना। उसके लाल, हरी, केसरिया और गुलाबी चारो रंग की पौशाक, चौपड़ और झूले की डोरी आ गयी। फिर उसके बाद उसने दसियों से मालूम करवाया कि राजा आज घूमने के लिए कौनसे बाग में जायेंगे। उसको पता चला की राजा आज गुलाब बाग में घूमने जायेंगे। उसने गुलाबी रंग की पौशाक पहन ली, सोलाह श्रृंगार करा और अच्छे अच्छे जेवर पहन लिए। और फिर वह गुलाबी चौपड़ और गुलाबी रस्सी लेकर गुलाब बाग में राजा के आने से पहले ही पहुंच गयी। बाग में पहुंच कर उसने गुलाबी चौपड़ बिछा दी और पास में ही झूला डाल कर झूलने लगी। राजा बाग में घूमने आये तो उन्होने उसे देखा और सोचने लगे कि कितनी सुन्दर राजकुमारी झूल रही है। रानी ने पूछा चौपड़ खेले। राजा ने हामी भरी। दोनों चौपड़ खेले, बातें करी और फिर राजा वहा से चले गए। राजमहल जाते समय राजा मन ही मन विचार करने लगे कि ऐसी सुन्दर कन्या तो अपने महल में होनी चाहिए। राजा के महल में आने से पहले ही छोटी रानी दसियों की मदद से राजमहल आ जाती है । अब दूसरे दिन रानी ने पता कराया, कि राजा कौनसे वाले बाग में जायेंगे। रानी को पता चला की राजा हरियाली बाग में जायेंगे। उस दिन रानी हरी पौशाक पहन कर और सौलह श्रृंगार करके, हरी चौपड़, हरी रस्सी लेकर दसियो को साथ में लेकर बाग पहुंच गयी। चौपड़ बिछाया, झूला लगवाया और झूलने लगी। राजा के आने पर दूसरे दिन भी वह पूछती है चौपड़ खेले। राजा कहते है है खेलते है। तीसरे दिन वह लाल बाग में गयी। लाल पोशाक पहनी,लाल चौपड़ ली और लाल रस्सी लेकर गयी। और फिर चौथे दिन केसरिया पौशाक पहन कर,केसरिया चौपड़ और रस्सी लेकर केसरिया बाग में गयी। राजा उस पर बहुत ही मोहित हो गए। पर राजकुमारी को तो मालूम था तो वो शर्माती नहीं थी। अगली रात रानी ने चारो पौशाकें, रस्सी और चौपड़ सब रानी के कक्ष के बाहर बरामदे में रख दिये और ऊँगली के चीरा लगाकर हाय हाय करने लगी। राजा को तो पहले से ही नींद नहीं आ रही थी और वह हाय हाय कर रही थी तो उन्हें तो बहुत ही गुस्सा आया। और वो बोले कि आज इस काले मुँह वाली को तलवार से मार डालू,इसका किस्सा ही खत्म कर देता हु। गुस्से में भरे हुए ही राजा उसके कक्ष की तरफ गए। उसके कक्ष के बाहर राजा क्या देखते है कि चारो रंग की पौशाक,चौपड़ और रस्सी पड़ी है। राजा को यह सब वहा देख कर सोचने लगे कि यह सब तो उस राजकुमारी के है, वो सोचने लगे कि ये सब यहाँ कैसे आ गए। जब राजा कक्ष के भीतर पहुंचे तो उन्हें रानी को देख कर बहुत आश्चर्य होता है। राजा रानी से कहते है कि आप यहाँ,रानी कहती है हा, फिर राजा कहते है कि रानी आपने हमें धोखा दिया। रानी कहती है मैंने आपको धोखा नहीं दिया। आपने मुझे धोखा दिया। राजा कहते है कि तुम्हारे चेहरे पर तो गिलहरी की तरह काली लकीरे थी। रानी कहती है कि वो तो आपकी बड़ी रानी ने मुझे प्यार करते समय लगा दी थी। उसको लगा होगा कि मेरे आने से आप उसको कमानेति कर दोगे। छोटी रानी फिर बोलती है कि मेरे तो दशामाता का इष्ट है जो दशामाता ने मेरी लाज रखी। वार्ना मुझे तो मरना पड़ता। राजा कहते है रानी आप पूरी बात पहले ही बता देते तो आपको और हमको इतना दुःख नहीं देखना पड़ता। उसके बाद राजा ने बड़ी रानी को कमानेती कर दिया और छोटी रानी के साथ सुखपूर्वक रहने लगे।

दशा माता मन्त्र

ॐ दशा माता नमोः नमः, श्री दशा माता नमोः नमः, जय जय दशा माता नमोः नमः, ॐ जय श्री दशा माता नमोः नमः
इस मन्त्र का उच्चारण 108 बार किया जाना चाहिए ।
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